
‘Free और Fair’
लोकतंत्र का ‘Free और Fair’ त्योहार या ‘मैनेजमेंट’ का खेल?
क्या भारतीय चुनाव आयोग वाकई स्वतंत्र है? ईवीएम (EVM) विवाद से लेकर चुनावी चंदे और वोटरों को लुभाने के हथकंडों तक, जानिए क्या भारत में चुनाव वाकई निष्पक्ष होते हैं।
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है और चुनाव को इसका ‘महाकुंभ’ या ‘त्योहार’। हर पांच साल में करोड़ों लोग अपनी उंगली पर नीली स्याही लगवाकर गर्व महसूस करते हैं कि उन्होंने अपनी सरकार चुनी है। लेकिन क्या यह प्रक्रिया उतनी ही पारदर्शी है जितनी हमें दिखाई देती है?
जब हम “Free and Fair” शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो इसका मतलब है कि हर नागरिक बिना किसी डर के, बिना किसी लालच के और एक ऐसे माहौल में वोट दे सके जहाँ चुनाव कराने वाली संस्था किसी के दबाव में न हो। लेकिन आज के दौर में बढ़ता धनबल (Money Power), बाहुबल (Muscle Power), और संस्थागत निष्पक्षता पर उठते सवाल हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हम वाकई अपनी मर्जी से नेता चुन रहे हैं या हमें वही चुनने पर मजबूर किया जा रहा है जिसे सिस्टम चाहता है?
1. चुनाव आयोग (ECI) ‘Free और Fair’: निष्पक्ष अंपायर या ‘कठपुतली’?
किसी भी मैच की निष्पक्षता उसके अंपायर पर निर्भर करती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र संस्था बनाया गया है। लेकिन हालिया वर्षों में इसकी नियुक्ति प्रक्रिया और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं।
नियुक्ति का विवाद
पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पूरी तरह से सरकार के हाथ में थी। सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर इसमें पारदर्शिता लाने की कोशिश की, लेकिन सरकार ने नया कानून लाकर चयन समिति में बहुमत अपने पास रख लिया। जब चयन करने वाले ही सत्ता पक्ष के लोग होंगे, तो क्या चुना गया अधिकारी सरकार के खिलाफ कड़े फैसले ले पाएगा?
आदर्श आचार संहिता ‘Free और Fair'(Model Code of Conduct) का दोहरा मापदंड
अक्सर देखा गया है कि सत्ता पक्ष के बड़े नेताओं द्वारा विवादित बयान दिए जाने पर चुनाव आयोग ‘क्लीन चिट’ देने में तेजी दिखाता है, जबकि वही गलती अगर विपक्ष का कोई छोटा नेता करे, तो उस पर तुरंत पाबंदी लगा दी जाती है। क्या नियम सिर्फ उनके लिए हैं जिनके पास सत्ता नहीं है?
2. धनबल Aur ‘Free और Fair’ (Money Power): लोकतंत्र की सबसे बड़ी दीमक

चुनाव अब विचारधारा की लड़ाई नहीं, बल्कि ‘खर्चे’ की लड़ाई बन गए हैं। एक आधिकारिक सीमा (Limit) होने के बावजूद, चुनाव में हज़ारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं।
- चुनावी चंदा और पारदर्शिता: ‘इलेक्टोरल बॉन्ड्स’ (Electoral Bonds) के मुद्दे ने यह साफ कर दिया कि पर्दे के पीछे से बड़ी कम्पनियाँ राजनीतिक दलों को पैसा देती हैं। बदले में उन्हें क्या मिलता है? नीतियाँ उनके पक्ष में बनाई जाती हैं। यह ‘क्रॉनी कैपिटलिज्म’ लोकतंत्र के निष्पक्ष होने के दावे को खोखला करता है।
- वोटों की खरीद-फरोख्त: गाँवों और गरीब बस्तियों में चुनाव से ठीक एक रात पहले ‘नोट और बोतल’ का जो खेल चलता है, वह किसी से छिपा नहीं है। जब एक वोट की कीमत 500 रुपये या एक साड़ी तय हो जाए, तो वहां ‘Fair’ शब्द का कोई मोल नहीं रह जाता।
3. ईवीएम (EVM) और वीवीपैट (VVPAT): मशीन पर भरोसा या शक?
EVM को लेकर देश में एक बड़ा वर्ग सशंकित रहता है। हालाँकि चुनाव आयोग बार-बार कहता है कि मशीनें हैक नहीं की जा सकतीं, लेकिन सवाल तकनीक से ज्यादा ‘भरोसे’ का है।
- VVPAT की 100% गिनती क्यों नहीं? विपक्ष और नागरिक समाज लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि कम से कम 50% से 100% VVPAT पर्चियों की गिनती की जाए ताकि जनता को यकीन हो कि उनका वोट सही जगह गया है। लेकिन इस पर आयोग और अदालतों का रुख अक्सर टालमटोल वाला रहा है।
- मशीन और सॉफ्टवेयर: दुनिया के कई विकसित देशों (जैसे जर्मनी) ने EVM छोड़कर वापस बैलेट पेपर अपना लिया है क्योंकि उन्हें मशीन पर भरोसा नहीं था। भारत में जब मशीनें खराब होती हैं या स्टोररूम से ‘लावारिस’ मशीनें मिलती हैं, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजमी है।
4. मीडिया और प्रोपेगेंडा: माइंड गेम का शिकार वोटर

चुनाव सिर्फ वोटिंग के दिन नहीं लड़ा जाता, यह चुनाव से महीनों पहले ‘दिमाग’ में लड़ा जाता है। और इसमें सोशल मीडिया और मुख्यधारा का मीडिया (Godi Media) मुख्य भूमिका निभाते हैं।
- फेक न्यूज और डीपफेक: आज AI और एडिटिंग के जरिए किसी भी नेता का झूठा वीडियो बनाकर वायरल कर दिया जाता है। एक आम वोटर, जिसे सच और झूठ का फर्क नहीं पता, वह इस प्रोपेगेंडा का शिकार हो जाता है।
- मीडिया का एकतरफा झुकाव: जब देश के बड़े न्यूज चैनल 24 घंटे सिर्फ एक ही पार्टी का महिमामंडन करें और विपक्ष के जायज सवालों को भी ‘देशद्रोह’ करार दें, तो क्या वह चुनाव निष्पक्ष कहा जा सकता है? मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होना चाहिए था, लेकिन वह अब सत्ता का ‘प्रवक्ता’ बन चुका है।
5. सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग (D.I.C.E. फैक्टर)
D.I.C.E. यानी DBI, IT, CBI, और ED। चुनाव के ठीक पहले विपक्षी नेताओं पर छापेमारी करना, उनके बैंक खाते फ्रीज कर देना या उन्हें जेल में डाल देना—क्या यह एक ‘Level Playing Field’ (समान अवसर) प्रदान करता है?
जब एक टीम के हाथ-पैर बांध दिए जाएं और दूसरी टीम को खुला छोड़ दिया जाए, तो उसे खेल नहीं, ‘फिक्सिंग’ कहते हैं। चुनाव के दौरान सरकारी तंत्र का इस्तेमाल अक्सर सत्ताधारी दल को फायदा पहुँचाने के लिए किया जाता है, जो ‘Free’ चुनाव की परिभाषा के विपरीत है।
6. बाहुबल और डराने की राजनीति
भले ही शहरी इलाकों में हिंसा कम हुई हो, लेकिन आज भी कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में ‘बूथ कैप्चरिंग’ का आधुनिक रूप मौजूद है। दलितों, अल्पसंख्यकों और गरीबों को वोट देने से रोकना या उन्हें किसी खास निशान पर बटन दबाने की धमकी देना आज भी कड़वी सच्चाई है। चुनाव के बाद होने वाली राजनीतिक हिंसा (जैसे बंगाल या अन्य राज्यों में) वोटरों के मन में डर पैदा करती है, जिससे वे अगली बार अपनी स्वतंत्र मर्जी से वोट नहीं दे पाते।
7. क्या जनता भी जिम्मेदार है?
हम सिस्टम को दोष तो देते हैं, लेकिन क्या एक नागरिक के तौर पर हम अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं?
- जब हम किसी अपराधी छवि वाले नेता को सिर्फ अपनी जाति या धर्म का होने के कारण वोट देते हैं, तो हम लोकतंत्र को खुद बर्बाद करते हैं।
- जब हम ‘मुफ्त की रेवड़ियों’ (Freebies) के चक्कर में दीर्घकालिक विकास (Long-term Development) को भूल जाते हैं, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों का सौदा कर रहे होते हैं।
8. समाधान: कैसे हो सकते हैं चुनाव सच में निष्पक्ष?
सिर्फ कमियाँ गिनाने से काम नहीं चलेगा, हमें सुधारों की बात करनी होगी:
- चुनाव आयोग की स्वायत्तता: मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में न्यायपालिका की अनिवार्य भूमिका होनी चाहिए।
- चुनावी खर्च पर लगाम: राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का एक-एक पैसा सार्वजनिक होना चाहिए।
- VVPAT सत्यापन: कम से कम 50% पर्चियों का मिलान अनिवार्य हो।
- मीडिया रेगुलेशन: चुनाव के दौरान मीडिया को संतुलित कवरेज देने के लिए सख्त दिशा-निर्देश होने चाहिए।
- शिक्षा और चेतना: युवाओं को ‘नौकरी के लिए शिक्षा’ के साथ-साथ ‘लोकतांत्रिक शिक्षा’ भी देनी होगी।
निष्कर्ष: उम्मीद या अंत?
भारत में चुनाव “Free” तो शायद हो जाते हैं (क्योंकि कोई बंदूक की नोक पर वोट नहीं मांग रहा), लेकिन क्या वे “Fair” हैं? इस पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। जब तक धनबल, संस्थागत दबाव और प्रोपेगेंडा का बोलबाला रहेगा, तब तक आम आदमी की आवाज़ संसद में कम और शोर में ज्यादा दबी रहेगी।
लोकतंत्र कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे एक बार हासिल कर लिया और काम खत्म। इसे हर दिन बचाना पड़ता है—सवाल पूछकर, विरोध दर्ज करके और सबसे महत्वपूर्ण, अपनी ‘सोच’ को किसी का गुलाम न बनाकर।
मुन्ना फिलो राय: अगली बार जब आप वोट देने जाएं, तो सोचिए कि आप एक नेता चुन रहे हैं या एक विज्ञापन (Advertisement)? लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब आप ‘भक्त’ या ‘चमचे’ नहीं, बल्कि एक ‘जागरूक नागरिक’ बनेंगे।
आपको क्या लगता है? क्या आपको चुनाव प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है? क्या आपने कभी अपने आसपास वोट के बदले पैसे या शराब बंटते देखी है? अपने विचार नीचे कमेंट्स में ज़रूर साझा करें!
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