
भारत में लोकतंत्र
क्या आपको लगता है कि हर पाँच साल में उंगली पर नीली स्याही लगवा लेना ही लोकतंत्र है? अगर हाँ, तो शायद हम एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का खिताब जीतना एक बात है, और उस लोकतंत्र को असलियत में जीना दूसरी। आज हमारे देश में लोकतंत्र (Democracy) एक ऐसी गाड़ी बन गई है, जिसके पहिए तो असली हैं, लेकिन इंजन शायद ‘जुगाड़’ पर चल रहा है।
भारत में लोकतंत्र वोट की कीमत: पैसा, शराब या जज़्बात?
हमारे देश में चुनाव तो होते हैं, लेकिन जिस ‘मेथड’ से वोट मांगे जाते हैं, वह लोकतंत्र के चेहरे पर तमाचा है। आज भी एक बड़ी आबादी को लालच देकर या धर्म के नाम पर डराकर वोट लिया जाता है।
यहाँ ‘अनएजुकेटेड’ (Uneducated) होने का मतलब सिर्फ डिग्री न होना नहीं है। असली अनएजुकेटेड वह है जो पढ़ा-लिखा तो है, अच्छी नौकरी भी कर रहा है, लेकिन उसकी सोच और समझ आज भी व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी या प्रोपेगेंडा के घेरे में कैद है। जब तक हम ‘सोचने’ के लिए नहीं पढ़ेंगे, तब तक हम सिर्फ ‘वोट बैंक’ बने रहेंगे, ‘नागरिक’ नहीं।

2. भारत में लोकतंत्र के तीन खंभे: क्या सब ‘स्वतंत्र’ हैं?
लोकतंत्र तीन मजबूत खंभों पर टिका होता है, लेकिन क्या भारत में ये खंभे दीमक की चपेट में हैं?
- विधायिका (Legislature): हमारे माननीय सांसद और विधायक। चुनाव के वक्त ये आपके पैरों में होते हैं, और जीतने के बाद हवा में। डेटा बताता है कि कई सांसदों का ‘MPLADS’ फंड (क्षेत्र के विकास का पैसा) बैंक खातों में सड़ता रहता है, जबकि जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती है। यहाँ विकास से ज्यादा ‘सत्ता’ की भूख है।
- कार्यपालिका (Executive): यह सबसे अजीब विडंबना है। जिस व्यक्ति को शिक्षा की बुनियादी समझ नहीं, वह शिक्षा मंत्री बन सकता है। जिसे पर्यावरण की परवाह नहीं, वह पर्यावरण मंत्रालय संभाल रहा है। जब विशेषज्ञता (Expertise) के बजाय वफादारी के आधार पर पद बाँटे जाते हैं, तो सिस्टम का फेल होना तय है।
- न्यायपालिका (Judiciary): न्यायपालिका को लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद माना जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह से न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं, उसने आम आदमी के भरोसे को हिला दिया है। न्याय में देरी और चुनिंदा मामलों में तत्परता ने ‘कानून सबके लिए बराबर है’ वाली बात पर सवालिया निशान लगा दिया है।
3. भारत में लोकतंत्र चुनाव आयोग और निष्पक्षता का सवाल
हाल के दिनों में चुनाव आयोग (Election Commission) की भूमिका पर भी काफी बहस हुई है। जब आयोग के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग विपक्ष के नेताओं को अजीबोगरीब जवाब देते हैं या ‘CCTV फुटेज’ जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बचकाने तर्क देते हैं, तो जनता का शक गहराना लाजिमी है। एक स्वतंत्र संस्था का सत्ता के साथ खड़े दिखना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
4. भारत में लोकतंत्र जागरूकता या बर्बादी का औज़ार?
डिजिटल इंडिया के इस दौर में सोशल मीडिया ने लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय उसे ‘बर्बाद’ करने में बड़ी भूमिका निभाई है। एल्गोरिदम हमें वही दिखाता है जो हम देखना चाहते हैं, जिससे समाज दो हिस्सों में बंट गया है। लोग सच नहीं देखना चाहते, वे सिर्फ ‘अपना सच’ देखना चाहते हैं।
5. भारत में लोकतंत्र का दम घोटना और ‘वॉशिंग मशीन’ राजनीति
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष उतना ही जरूरी है जितनी ऑक्सीजन। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि विपक्ष के नेताओं पर ED और CBI की ऐसी जांच बैठती है कि मानो भ्रष्टाचार सिर्फ एक ही तरफ है। और मजे की बात देखिए, जैसे ही कोई ‘दागी’ नेता सत्ता पक्ष में शामिल होता है, वह रातों-रात बेदाग हो जाता है। क्या राजनीति अब ‘वॉशिंग मशीन’ बन गई है?
6. क्या भारत में लोकतंत्र खत्म हो चुका है?
जब पुलिस अपना धर्म भूल जाए, मंत्री अपनी जिम्मेदारी भूल जाए और जनता अपना विवेक खो दे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र ‘वेंटीलेटर’ पर है। आज भारत का लोकतंत्र एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ हमें खुद से पूछना होगा: क्या हम वाकई आज़ाद हैं, या हम सिर्फ अपनी पसंद का ‘तानाशाह’ चुनने की आज़ादी का जश्न मना रहे हैं?
निष्कर्ष: लोकतंत्र सिर्फ नेताओं से नहीं, हमसे बनता है। अगर हम जाति, धर्म और मुफ्त के लालच में बिकते रहेंगे, तो हमें शिकायत करने का कोई हक नहीं है। बदलाव की शुरुआत सवाल पूछने से होती है। क्या आप सवाल पूछने के लिए तैयार हैं?
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